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Saturday, August 22, 2009

विदेश नीति में आर्थिक विकास की भूमिका
 

 
 
झंडा
भारत के प्रति बड़े देशों की विदेश नीति में अहम बदलाव आए हैं
पिछले कुछ समय कई बड़े देशों के नेताओं ने भारत का दौरा किया है.
फ़रवरी, 2006 में फ़्रांस के राष्ट्रपति ज़्याक शिराक ने भारत का दौरा किया, मार्च 2006 में अमरीकी राष्ट्रपति बुश भारत आए और फिर मार्च में ही रूसी प्रधानमंत्री भी भारत पहुँचे.
पिछले कुछ समय से भारत को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी गहमागहमी रही है. अगर पिछले कुछ सालों में भारत के प्रति अमरीका और फ़्रांस जैसे दूसरे देशों की विदेश नीति पर नज़र डालें तो इसमें बड़ा बदलाव नज़र आया है.
फ़्रांस और अमरीका ने भारत के साथ परमाणु समझौतों पर हस्ताक्षर किए. दोनों देशों के नेताओं से साथ उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी आए जिसमें मुख्य तौर पर बड़े उद्योगपति और व्यापार से जुड़े लोग थे.
तो आख़िर क्या वजह है भारत को लेकर बढ़ी इस हलचल की- ख़ासकर भारत से आर्थिक रिश्ते मज़बूत करने को लेकर.
 विदेश नीति के निर्माण में जो समीकरण काम करते हैं, उनमें अर्थशास्त्र का गणित काफ़ी अहम हो गया है.
 
तेंजिंदर खन्ना, पूर्व वाणिज्य सचिव, भारत
ज़ाहिर है वैश्वीकरण के दौर में हर देश अपना आर्थिक फ़ायदा देख रहा है.
भारत के पूर्व वाणिज्य सचिव तेजिंदर खन्ना कहते हैं कि ऐसे में विदेश नीति के निर्माण में जो समीकरण काम करते हैं, उनमें अर्थशास्त्र का गणित काफ़ी अहम हो गया है.
जॉर्ज बुश ने अपने भारत दौरे के दौरान यहाँ बसने वाले 20 करोड़ के मध्यम वर्ग की बात की थी और उनकी नज़र इसी मध्यम वर्गीय बाज़ार पर थी.
दूसरे देशों की भारत के प्रति बदलती विदेश नीति में भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति का प्रतिबिंब देखा जा सकता है.
तो क्या उभरती आर्थिक महाशक्ति का नया दर्जा भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए दोस्त और सहयोगी दिलवा रहा है?
अमरीका का बदला रुख़
बुश-मनमोहन
अमरीका ने भारत के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं
भारत-अमरीका रिश्तों पर ही ग़ौर करें तो शीत युद्ध के दौरान दोनों देशों के रिश्तों में मिठास कम और खटास ज़्यादा रही है.
करीब तीन दशकों तक अमरीका भारत को परमाणु तकनीक देने से इनकार करता रहा.
तो आज आख़िर ऐसा क्या बदल गया है कि अमरीका ने अंतरराष्ट्रीय कायदों को दरकिनार करते हुए भारत के साथ परमाणु समझौता किया है.
एक ध्रुवीय दुनिया की एकमात्र महाशक्ति यानि अमरीका ने परमाणु समझौता किया तो उसके बाद रूस भी भारत को तारापुर संयत्र के लिए यूरेनियम देने पर राज़ी हो गया.
 "परमाणु उर्जा में अमरीका के लिए भारत में करीब 22 से 35 अरब डॉलर का बाज़ार है, इसके अलावा उपकरण और प्लांट लगाने का बाज़ार अलग. दूसरा ये कि अमरीका नहीं चाहता कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए ईरान जैसे देशों पर निर्भर रहे
 
डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव, दक्षिण एशिया मामलों के सलाहकार, बुश प्रशासन
दक्षिण एशिया के मामलों में बुश प्रशासन के सलाहकार और अमरीका की जॉर्जिया विश्वविद्यालय में एशिया कार्यक्रम के निदेशक डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव परमाणु समझौते के बारे में कहते हैं, "परमाणु उर्जा में अमरीका के लिए भारत में करीब 22 से 35 अरब डॉलर का बाज़ार है, इसके अलावा उपकरण और प्लांट लगाने का बाज़ार अलग. दूसरा ये कि अमरीका नहीं चाहता कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए ईरान जैसे देशों पर निर्भर रहे."
इस साल मार्च महीने में अमरीकी राष्ट्रपति बुश की भारत यात्रा का एक अहम पहलू आर्थिक रिश्तों को मज़बूत करना था.
आर्थिक सहयोग
आज भारत एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है और इसक बात की अहमियत समझते हुए हर बड़ा देश भारत के साथ व्यापार करना चाहता है.
 एक समय था जब फ़्रांस भारत में निवेश नहीं करना चाहता था और भारत उसके आगे पीछे घूमता था व्यापार करने के लिए, लेकिन आज स्थिति उलटी है
 
वैजू नरावने, पत्रकार
जॉर्ज बुश से पहले इसी साल फ़रवरी में फ़्रांसीसी राष्ट्रपति ज़्याक शिराक भी भारत आए और भारत के साथ परमाणु समझौता किया.
फ्रांस में लंबे समय से रह रहीं भारतीय मूल की पत्रकार वैजू नरावने कहती हैं,“एक समय था जब फ़्रांस भारत में निवेश नहीं करना चाहता था और भारत उसके आगे पीछे घूमता था व्यापार करने के लिए, लेकिन आज स्थिति उलटी है.”
भारत और फ़्रांस ने यूरोपीय कंपनी एयरबस से 43 यात्री विमानों की ख़रीद के बारे में भी समझौते पर दस्तख़त किए हैं. इससे पहले वर्ष 2005 में भारत और फ़्रांस ने स्कोर्पीन श्रेणी की छह पनडुब्बियों के भारत में निर्माण पर भी समझौता किया था.
पूर्व सोवियत संघ से तो हमेशा ही भारत के दोस्ताना संबंध रहे हैं और अब रूस भी भारत के साथ आर्थिक संबंधों की अहमियत को समझता है. पिछले पाँच सालों में रूस ने भारत को करीब 10 अरब डॉलर मूल्य के हथियार बेचे हैं.
डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव का कहना है कि आज रूस, इसराइल और अमरीका जैसे देश भारत को अपने हथियार बेचना चाहते हैं क्योंकि रक्षा उपकरणों के आधुनिकीकरण के बजट के मामले भारत दूसरे नंबर है.
सामरिक फ़ायदा
शिराक-मनमोहन
फ़्रांस के राष्ट्रपति फ़रवरी में भारत दौरे पर आए थे
फ़्रांस में पत्रकार वैजू नरावने कहती हैं कि आर्थिक शक्ति का फ़ायदा भारत को सामरिक क्षेत्रों में भी मिला है. वे कहती हैं," फ़्रांस पहले पाकिस्तान और भारत के बीच संतुलन बिठा कर चलता था लेकिन आज चूंकि भारत एक बड़ा आर्थिक बाज़ार है तो फ़्रांस पाकिस्तान की तुलना में भारत को ज़्यादा तरजीह देता है."
भारत और पाकिस्तान के साथ अमरीका के संबंधों पर डॉक्टर अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं, "भारत की आर्थिक और सामरिक अहमियत को देखते हुए अब अमरीका भारत और पाकिस्तान से अपने रिश्तों को अलग अलग खाँचे में रखता है."
वहीं भारत के पूर्व वाणिज्य सचिव तेजिंदर खन्ना कहते हैं, " दूसरे देशों की विदेश नीति के निर्धारक अब ये मानते हैं कि भारत को हाशिए पर नहीं रखा जा सकता. भारत को आर्थिक तरक्की का राजनीतिक फ़ायदा भी मिला है.
भारतीय रूख़ में बदलाव
इसी तरह भारत की विदेश नीति पर भी उसके आर्थिक हितों का प्रतिबिंब देखा जा सकता है.
 "भारत ने काफ़ी आर्थिक तरक्की की है, दूसरे देशों की विदेश नीति के निर्धारक अब ये मानते हैं कि भारत को हाशिए पर नहीं रखा जा सकता. आर्थिक तरक्की का राजनीतिक फ़ायदा भी मिला है
 
तेजिंदर खन्ना, पूर्व वाणिज्य सचिव, भारत
भारत के पड़ोसी देशों की बात करें तो चीन से सुधरते संबंधों के पीछे भी दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग का बड़ा हाथ माना जाता है. दो उभरती हुई आर्थिक महाशक्तियाँ शायद ये भली भांति समझती हैं कि आपसी मतभेदों को एक ओर रखकर आर्थिक सहयोग में ही फ़ायदा है.
भारत-चीन के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों को अमरीका एक खतरे के तौर पर देखता है. माना जा रहा है कि अमरीका भारत से अपनी बढ़ती नज़दीकियों को, भारत-चीन संबंधों की काट के तौर पर भी इस्तेमाल करना चाहता है.
दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान से भी भारत व्यापारिक रिश्ते प्रगाढ़ करने पर ज़ोर दे रहा है और भारत की " लुक ईस्ट " नीति इसी का हिस्सा है.
मध्य पूर्व
तेल पाइपलाइन

यहाँ मध्य पूर्व से भारत के रिश्तों के ताने बाने को भी समझना होगा.
मध्य पू्र्व के कई देशों से भारत के मैत्रीपूर्ण संबंध हैं. इसमें पुराने सांस्कृतिक संबंधों के अलावा भारत के अपने आर्थिक हितों का भी हाथ है क्योंकि तेल के आसमान छूते दाम किसी भी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं.
तेल और ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि आज की तारीख़ में आर्थिक हित ही भारत की विदेश नीति में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और इसमें भी तेल का खेल काफ़ी अहम है. भारत करीब 60 फ़ीसदी तेल मध्य पूर्व से आयात करता है.मध्य पूर्व के देश भी भारत को बड़े बाज़ार के तौर पर काफ़ी अहमियत दे रहे हैं.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं," मध्य पूर्व के देशों को पता है भारत को तेल की ज़रूरत है और उसके पास तेल खरीदने की आर्थिक क्षमता भी है."
 आर्थिक हित ही भारत की विदेश नीति में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और इसमें भी तेल का खेल काफ़ी अहम है. मध्य पूर्व के देश भी भारत को बड़े बाज़ार के तौर पर काफ़ी अहमियत दे रहे हैं
 
नरेंद्र तनेजा, तेल मामलों के जानकार
यानि विदेश नीति के ताने बाने को समझने की कोशिश करें तो आज किसी भी देश की विदेश नीति के निर्माण में आर्थिक पक्ष चुंबकीय आकर्षण की शक्ति रखता है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का सकारात्मक पहलू ये भी कि अमरीका और फ़्रांस जैसे देश उसे एक ज़िम्मेदार लोकतांत्रिक देश मानते हैं जिसका काफ़ी सामरिक महत्व है और वे भारत के साथ अच्छे रिश्ते बना कर रखना चाहते है.
यानि मज़बूत अर्थव्यवस्था ने भारत की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी मज़बूत कर दी है.
अपनी आर्थिक शक्ति की बदौलत भारत आज उस मोड़ पर आ खड़ा है जहाँ से चाहे-अनचाहे दुनिया के बड़े देशों को होकर गुज़रना पड़ रहा है- फिर वो भारत से बरसों दूर रहा अमरीका हो या फिर फिर पुराना मित्र रूस या पड़ोसी देश चीन.
 
 
किसानकृषि में संभावनाएँ
भारतीय अर्थव्यवस्था तो तेज़ी से बढ़ रही है पर कृषि क्षेत्र पीछे छूट रहा है.
 
 
भारतीय अर्थव्यवस्थाकिस मोड़ पर है?
आज की तारीख़ में किस मोड़ पर खड़ी है भारतीय अर्थव्यवस्था?
 
 
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